एक पुराने बरगद के नीचे,
हम बैठा करते थे,
पीहू की मधुर आवाज़ में,
हम भी गुनगुनाया करते थे,
सूर्य का उग्र रूप हुआ करता था,
पर बरगद का पेड़,
ममता रूपी आँचल से,
हमें ढक कर रखता था,
जनसंख्या की ऐसी आंधी आयी,
सरकार ने सड़क बनवाई,
बरगद के पेड़ को उखाड़ डाला.
पीहू के घर को उजाड़ डाला.
अब चारों तरफ कोलाहल,
मोटर गाड़ियों का शोर .
मानो प्रकृति पर जनसंख्या,
भारी हो रही है.
और मानव द्वारा निर्मित,
उसकी इस व्यवस्था से,
खुद उसी के विनाश की,
तैयारी हो रही है..
आशीष "पीहू"

बेहतरीन रचना,प्रकृति पर जनसंख्या द्वारा हो रहे अतिक्रमण को इंगित करती यह रचना खूबसूरत है.
ReplyDeleteलेखनी को कायम रखें.